
भगवान की सृष्टि
-- शुभेच्छा पात्रा
कक्षा: 10 'आई'
"नानी! नानी!! एक कहानी सुनाओ न।" -- अथर्व अपनी नानी के पल्लू को खींचता हुआ बोला।
"बेटा, रुक जाओ थोड़ी देर। मुझे काम करना है अभी।"
"नहीं! मुझे अभी कहानी सुनाओ।"
"अच्छा, ठीक है। लेकिन चुपचाप सुनना।"
" ठीक है।" -- अथर्व खुशी से बोला।
बहुत समय पहले की बात है। भगवान ने एक मिट्टी का गोला बनाया। वह गोला बहुत ही अद्वितीय और सुंदर था, लेकिन उसमें जीवन की शक्ति की कमी थी। भगवान ने तय किया कि वह विभिन्न प्राणियों और पक्षियों को जोड़कर इस गोले को जीवंत बनाएँगे। उन्होंने पहले पेड़-पौधे बनाए जिससे वह गोला और भी मनमोहक लगने लगा। फिर उन्होंने पक्षियों को बनाया। कुछ बड़े तो कुछ छोटे। उन्हें उड़ने की क्षमता भी दे दी, जिससे आसमान और भी ज्यादा रंग-बिरंगी लगने लगा। उन्होंने फिर मछलियों की सृष्टि की और उन्हें तैरने की क्षमता दी जिससे नदी, तालाब, समुद्र इन मछलियों से भर उठे। भगवान ने फिर कई जानवरों की रचना की। कुछ जानवरों को छोटा, मासुम और अहानिकारक बनाया तो वहीं उन्होंने कुछ जानवरों को विशाल और भयानक बनाया। भगवान की इन रचनाओं के बाद वह मिट्टी का गोला अब खिल उठा था, परंतु भगवान को अभी भी संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई थी। वह फिर मिट्टी से कुछ बनाने का प्रयास कर रहे थे। इस बार उन्होंने एक दो पैरों वाला प्राणी बनाया। उन्होंने तय किया कि वह इस प्राणी में थोड़ा-थोड़ा करके अब तक निर्मित सभी प्राणियों की क्षमताओं को कम कम मात्रा में उसे प्रदान करेंगे। ... और फिर इस प्रकार जन्म हुआ मानव का। इस तरह भगवान ने अपनी रचना, अपनी सृष्टि को पूरा किया और दुनिया को सुंदर और संतुलित बनाया जहाँ प्राणी अपनी योग्यताओं के साथ रह सकते हैं और मानव अपनी बुद्धिमत्ता और समझ से ईश्वर की संरचना को और अधिक विकसित कर सकता है।
"नानी! यदि मैं भी मिट्टी से खिलौना बनाऊँ तो मुझे भी नए नए खिलौने मिल जाएँगे न?" -- अथर्व ने मासूमियत से पूछा। परंतु जवाब के बदले उसके मासूम सवाल पर उसकी नानी हँस पड़ी।
"क्या हुआ? हंस क्यों रही हो?" -- इस बार उसने थोड़े गुस्से से पूछा।
"कुछ नहीं। चलो, अभी सो जाओ। बहुत रात हो गई है। इस प्रश्न का उत्तर मैं तुम्हें कल बताऊँगी।"
"पक्का?"
"हाँ बाबा, पक्का।" (आत्मकथा)